सोमवार, 28 जनवरी 2013

स्वयं के लिये चिंतन का समय - आत्म मंथन

आज अचानक एक अन्तराल के बाद लगा, कि शायद एक बार फिर आत्म चिंतन और मंथन का समय आ गया है। और सोचा कि भले ही मुझे अपने चलते हुए जीवन को कुछ विराम देना पड़े, पर कुछ समय ढहर कर यह कार्य करना अत्यंत आवश्यक है। जरुरी इसलिए, कि अभी एक लम्बा रास्ता सामने चलने के लिए बाकी है, सो यह तैयारी भी जरुरी है।

ज्यादातर, हम सभी अपने जीवन की आपा-धापी में इतने व्यस्त रहते हैं कि कभी कुछ सोचने का समय ही नहीं मिलता. और जो थोड़ा  बहुत समय मिलता भी है, वह पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने या फिर सैर सपाटे और मौज मस्ती में ही निकल जाता है. हम में से अधिकतर लोग कभी रुकते ही नहीं हैं, बस अपनी ही लौं में भागते चले जाते हैं, जैसे किसी मृग मरीचिका का पीछा कर रहे हों. हम जितना उसके पास जाने या उसे पाने की कोशिश करते है, वह उतनी ही दूर हमसे होती जाती है. या वह अगर मृग मरीचिका न भी हो तो हम में से को ज्यादातर को मालूम ही नहीं होता कि हम अपने जीवनकाल क्या पाना या हासिल करना चाहते है. परन्तु बस भागते रहते  है. और जब हम कभी पीछे मुड़कर देखते है तो मालूम चलता है, कि ज्यादा कुछ तो हासिल ही नहीं कर पाये और जो किया भी था वह अपना न रहा. अफ़सोस.

अब आप कहेंगे, कि अगर प्रयास ही नहीं करेंगे तब तक तो कुछ भी हासिल न होगा और इसलिए लगातार प्रयासरत रहना जरुरी है और इसलिए जीवन की दौड़ लगातार भागते रहना भी सही है. बस यहीं आ कर मेरी सोच थोड़ी भिन्न हो जाती है.

असल में हम कभी भी वास्तविक आत्म मंथन या स्वयं से साक्षात्कार नहीं करते. और करते भी हैं तो उसमें अमूमन ईमानदारी की कमी होती है और इसलिए हमारा, अपनी क्षमताओं का आकलन बार-बार गलत सिद्ध होता है. हम अपनी असफलताओं का घड़ा हर बार किसी न किसी के सर फोड़ते रहते हैं. पर ऐसा नहीं है कि हमने मंथन के महत्व के बारे में सुना ही नहीं है. चलिए, मैं आपको थोड़ा याद दिला देता हूँ - समुद्र मंथन, शायद जबसे ज्यादा चर्चित है. यह मंथन देवताओं और राक्षसों के बीच हुआ था, जिसमें समुद्र का मंथन करने पर 14 रत्न निकले थे. और लक्ष्मी और अमृत भी उन रत्नों में से एक थे. ये दो रत्न, ऐसी दो चीजें है जिनको पाने की ललक में हम पूरा जीवन भागते हुए निकल देते है.

मैंने अपने आपको कभी नास्तिक की श्रेणी में नहीं रखा, पर कभी धर्मांध भी नहीं बन पाया और मैंने धर्म की परिभाषा को अपने हिसाब से पढ़ा. मैं इस समुद्र मंथन की कथा को दूसरी तरह पढता हूँ. मेरे लिए यह देवताओं (याने दैवीय शाक्तियों या फिर पॉजिटिव एनर्जी ) और राक्षसों (पाशविक शाक्तियों या फिर नेगेटिव एनेर्जी) का मंथन था. और मैंने इस कथा से यह सीखा कि हमें अपने जीवनकाल में हर थोड़े समय में आत्म मंथन करते रहना चाहिए, जिससे कि हम अपनी दैवीय और राक्षसी शक्तियों या प्रवार्तियों या फिर क्षमताओं को पहचाने और उनका, अपने जीवन विकास के लिए सही दोहन कर सकें. अपनी शक्तियों का, अपने विकास के लिए चुनाव हमे करना पड़ेगा. और बिना सही चुनाव के जीवन लक्ष्य को पाना कठिन है. एक ओर अगर हमारी पॉजिटिव शक्तियां हमें एक बेहतर इन्सान बनती हैं, तो हमारी पाशविक शक्तियाँ शायद हमें गलत तरीकों और रास्तों की ओर ले जाती है. और इसलिए अपने  छुपी इन शक्तियों या ताकतों की सही पहचान करना मेरे लिए बहुत  है.

और जब यह सब मेरे असुप्त मन में चल रहा था, तो सोचा कि अपनी यह सोच भी आप सबके साथ भी बाँट लूँ, न जाने कब किसके काम आ जाये और मेरे जैसे एक और पथिक को अपनी राह मिल जाये।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें